Moral victory is only a term or is it exists in politics?

 क्या मोरल विक्ट्री राजनीति में होती है या सिर्फ एक कथन है?
 

पिछले कुछ सालों में कुछ शब्दों का बेशुमार चलन रहा है, जैसे कि तीन तलाक, निकाह, भगवा आतंकवाद, मुताह  और सबसे महत्वपूर्ण हर एक चुनाव के बाद मोरल विक्ट्री यानी नैतिक जीत।
 जहां तक मेरा विश्वास है आजकल की राजनीति में मोरालिटी यानी नैतिकता नाम की कोई जगह ही नहीं बचा है। फिर भी मान लेते हैं।
 राजनीति और आजकल के नेता मोरल और एथिकल भी होते होंगे क्या? भले ही वह किसी भी राजनीतिक पार्टी से संबंध रखते हैं? मुझे तो नहीं लगता पर शायद होती भी हो।
आजकल जहां तक मोरल विक्टरी का सवाल है तो इसके बारे में जब कोई राजनेता या राजनीतिक पार्टी बात करती है तो ऐसा लगता है जैसे कि कोई जोक सुना रहा हो।
 पहले हम बात करते हैं मोरल विक्ट्री और उससे जुड़े कुछ घटनाओं के बारे में जिसके बाद हमें पता चलेगा कि आखिर मोरल विक्ट्री है क्या और आया कैसे?
http://currentwa.blogspot.in/2018/03/kya-guard-of-honour-har-ek-award-winner.html?m=1

 खासकर आजकल अधिकतर चुनाव गवाने वाली पार्टी कांग्रेस का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करती है, आखिर करे भी क्यों नहीं, क्योंकि नहीं वह चुनाव जीत पा रहे हैं और जहां बड़ी पार्टी बनकर भी आती है वहां अन्य दलों का समर्थन न मिलने के कारण सरकार नहीं बन पाती। और फिर शुरू होता है मॉडल विक्ट्री का प्रोपगेंडा।
 आखिर किसी भी तरह का सरकार बनाने के लिए संख्या बल की जरूरत पड़ती है और अगर आपके पास संख्याबल नहीं है तो आप की सरकार नहीं बन सकती।
 अगर किसी भी राज्य अगर या नगर पालिका चुनाव में आप के खिलाफ अधिक संख्या में उम्मीदवार जीते हैं तो आप की सरकार नहीं बनती, और सारे विपक्षी मिलकर के सरकार बनाते हैं। मतलब साफ है कि उनके पास संख्याबल है और समर्थन भी जनता का जिसके कारण सरकार बनाते हैं। अब अगर आपके पास संख्याबल ही नहीं है तो इसमें जीत किस बात की और मोरल विक्ट्री का सवाल कहां से आता है? मतलब साफ है कि जनता ने आपको पसंद नहीं किया जिसके कारण आप हार गए।

 अगर आप सिर्फ बड़ी पार्टी बनने के कारण यह कहते हैं कि यह मेरी मोरल विक्ट्री है तो फिर आजाद भारत में आज तक कितनी बार हुआ है जो कि सिर्फ मेजोरिटी की सरकार बनी है किसी भी राज्य या केंद्र में।
 आजाद भारत में अधिकतर सरकार गठबंधन में बनी हैं भले ही उसमें कोई भी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में हो या ना हो।
 जहां तक मेरी समझ है इसके अनुसार अगर किसी 6भी पार्टी की सरकार नहीं बनती है तो मोरल विक्ट्री या डिफिट इसी में है कि वह इस हार को स्वीकार कर ले ना कि इसे अपना मोरल विक्ट्री बता कर के और ज्यादा प्रोपगेंडा फैलाएं।
 जहां तक मेरा मानना है इस तरह के प्रोपोगंडा जनता के विश्वास को धोखा देगी और इससे आपको आने वाले चुनावों में और ज्यादा नुकसान होगा।

जहां तक मुझे लगता है कांग्रेस के लगातार हार के पीछे यह भी एक बहुत बड़ा कारण है और कांग्रेस को अपनी आगामी चुनाव की रणनीति से पहले यह समझ लेना चाहिए कि इस तरह के प्रोपगेंडा से अब जनता कभी सहमत नहीं होगी।
 और इस तरह के प्रोपेगैंडा भारतीय संविधान और भारतीय समाज के लिए नुकसानदेह हो सकता है, राजनीति के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
 अतः इस तरह का ना तो प्रसार करें और ना ही इस से सहमत हो।
अगर सियासत में शिकस्त हो तो शान जाती है।
 और जिंदगी में शिकस्त हो तो जान जाती है।।
इस बात को माने और इसके लिए गलत चीजों का या प्रोपगैंडा का सहारा ना ले।
आपको यह पोस्ट कैसा लगा अपना सुझाव जरूर दें कमेंट करें।
  धन्यवाद। जय हिंद।।
http://currentwa.blogspot.in/2018/03/apni-kshamta-ka-dusprog-nuksandeh-ho.html?m=1

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